Sunday, October 01, 2017

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥
~कबीर~
Devoid of desires, sans the worries, one who stays detached,
This triumph over the self, maketh an Emperor among Kings.
~Kabir~

Friday, August 11, 2017

पर्दानशीं हो दोज़ख और जन्नत साथ एक इमारत में | दोनों के मानिंद है मायने, फरक फ़क़त है इबारत में

पर्दानशीं हो दोज़ख और जन्नत साथ एक इमारत में
दोनों के मानिंद है मायने, फरक फ़क़त है इबारत में
pardaanashiin ho dozakh aur jannat saath ek imaarat mein
dono ke maanind hai maayne, farak faqat hai ibaarat mein
______________________________________________
The mind is its own place, and in itself can make a heaven of hell, a hell of heaven.
~John Milton, Paradise Lost, Book I~

Saturday, August 05, 2017

रंग-ए-ज़िन्दगी में डूब के काफी हूँ मैं कैफ़ी, लेकिन | अब तलक पी नहीं मैंने इतनी, जितना मुझे ख़ुमार है

रंग-ए-ज़िन्दगी में डूब के काफी हूँ मैं कैफ़ी, लेकिन
अब तलक पी नहीं मैंने इतनी, जितना मुझे ख़ुमार है
*कैफ़ी = मदहोश
*ख़ुमार = मदहोशी
rang-e-zindagi mein doob ke kaafi hoon main kaifi, lekin
ab talak pi nahin maine itni, jitna mujhe khumaar hai
______________________________________________
I don't want you to think I'm a drinker. I can stop if I want to, only I don't want to.
~Some Like It Hot (1959)~

Sunday, July 09, 2017

इंतहा मेरे हौसले की...

इंतहा मेरे हौसले की, या समझो नासमझी का जुनून है
ग़र गर्दिश में हों तारे, उनको गिनने में भी सुकून है
intehaa mere hausle ki, ya samjho nasamajhi ka junoon hai
'gar gardish mein ho taare, unko ginnne mein bhi sukoon hai

Sunday, March 26, 2017

हवा से आशिक़ी कर बारिश से फ़ुरक़त निभाई है / बादल की यह सिफ़त कब सहरा को समझ आयी है

हवा से आशिक़ी कर बारिश से फ़ुरक़त निभाई है
बादल की यह सिफ़त कब सहरा को समझ आयी है
hawaa se aashiqui kar baarish se furqat nibhayi hai
baadal ki yeh sifat kab sehraa ko samajh aayi hai
It is not for the desert to decipher why the clouds went along with the wind, but parted ways with the rains...

Friday, August 26, 2016

A tourist visited a Sufi saint.
He was astonished to see that the Sufi's home was a simple room. The only furniture was a mat and a kerosene lamp.
Tourist : "Sufi, where's your furniture?"
Sufi : "Where is yours?"
Tourist : "Mine? But I'm only a visitor here."
Sufi : "So am I."

Thursday, August 18, 2016

कल नासूर हुआ था, एक ज़ख़्म के चलते / आक़बत फिर संवर गयी, एक मरहम के लगते..

कल नासूर हुआ था
एक ज़ख़्म के चलते
आक़बत फिर संवर गयी 
एक मरहम के लगते
kal nasoor hua tha
ek zakhm ke chalte
aaqabat phir sanvar gayi
ek marham ke lagte
In another life, an evening of gray,
Said the angel, who I bowed to pray,
Love to un-love is a journey sans a tact,
Emotions must die as a matter of fact...
Now in the present from the Almighty,
Another being is becoming a deity,
Trusting the touch, I believe the word,
Salvage to nirvana in a turnaround unheard...

Friday, July 08, 2016

Death

In the marketplace of Baghdad, a man is jostled by Death.
Frightened, the man gets on a horse, and flees at top speed to Samarra, a distance of about 75 miles (125 km).
He believes he has outran and outwitted Death.
However by now, he and his horse are both dangerously dehydrated and thus the man frantically starts searching for water.
He finds a well, but to his utter shock, Death is standing in front of it.
He confronts Death and says “I saw you looking at me in Baghdad and I’ve been riding nonstop to get away from you. And it surprises me that despite all my efforts, you have found me here in Samarra.”
Death replies, “I was astonished too to see you in Baghdad, because all along our meeting was scheduled for Samarra.”
~Arab Folklore~

Sunday, June 05, 2016

ये साली ज़िंदगी...

ज़िंदगी पे तेरा मेरा किसी का ना ज़ोर है
हम सोचते है कुछ, वो साली सोचती कुछ और है
ये ज़िंदगी, ये साली ज़िंदगी
हम चाहते यहाँ है साली जाती कहीं ओर है
लम्हे और लम्हों के बीच टेढ़े मेढे मोड़ है
ये ज़िंदगी, ये साली ज़िंदगी...



Wednesday, June 01, 2016

The wolf inside me...

A native elder told his grandson that inside of him he has two wolves that are fighting with each other.
One wolf is angry and mean and the other is gentle and loving.
The grandson looked up and asked, “Grandfather, which one will win?”
And the grandfather answered, “Which ever one I feed the most.”
_______________________________________________
The wisdom behind this native folklore – in each of us, the good and the evil are always at war. All our lives the fight goes on between them, and one of them must conquer. And in our own hands lies the power to choose.
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Dear God, Dear Universe,
Please help me make wise choices, that I may discern between the good and the evil.
Amen!


निंदक

निंदक नियरे राखिये
आँगन कुटी छवाए
बिन पानी साबुन बिना
निर्मल करत सुभाय
~कबीर~
Nindak niyare rakhiye,
Angan kuti chawai
Bin pani sabun bina,
Nirmal kare subhaiy
~Kabir~
[जो हमारी निंदा करता है, उसे अधिकाधिक अपने पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है। Keep your critic close to you. Give him a cottage in the courtyard of your house, because he cleanses your nature without soap and water.]

Friday, May 06, 2016

दीवानगी

हर शख़्स दीवाना, हर इंसान यहाँ मजनू
मुख़्तलिफ़ दीवानगी, ज़ेहन में अलग है जनून
रह-गुज़ार-ए-सफ़र, रास्ते पर है सबके जुदा
कोई ज़र, कोई ज़र्रे में ढूंढता यहाँ अपना खुदा
Harr shakhs deewana, harr insaan yahan majnoon
Mukhtalif deewangi, zehan mein alag hai janoon
Rahguzaar-e-safar, raaste par hai sabke judaa
Koi zar, koi zarre mein dhoondta yahan apna khuda
________________________________
When we remember we are all mad, the mysteries disappear and life stands explained.
~Mark Twain~
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I'm a happy to report that I'm not alone. It's a madhouse out there.
~Paul Auster~

Tuesday, May 03, 2016

आग न बुझी...

नार-ए-दोज़ख से हाल-ए-बयान करता रहा
कुछ आग भी न बुझी, कुछ दाग भी जलता रहा
naar-e-dozakh se haal-e-bayaan karta raha
kuch aag bhi na bujhi, kuch daag bhi jalta raha

Sunday, May 01, 2016

एहसान-फ़रामोशी में हमदर्द को ही खाली किए जा रहा हूँ

मुकम्मल एहसान है मयखानों के मेरे खालीपन पे, लेकिन
एहसान-फ़रामोशी में हमदर्द को ही खाली किए जा रहा हूँ
mukammal ehsaan hai maikhaano ke mere khaalipan pe, lekin
ehsaan-faraamoshi mein ham-dard ko hi khaali kiye ja raha hoon

mukammal ehsaan hai maikhaano ke mere khaalipan pe, lekin  ehsaan-faraamoshi mein ham-dard ko hi khaali kiye ja raha hoon

Saturday, April 30, 2016

था ज़ाया कभी, इस बार मुक़म्मल होने का ऐतबार है

इश्क़ की आग में हवाओं पे नहीं मेरा इख्तिआर है
था ज़ाया कभी, इस बार मुक़म्मल होने का ऐतबार है
Ishq ki aag mein hawaaon pe nahin mera ikhtiyaar hai
Tha zaaya kabhi, iss baar mukammal hone ka aitbaar hai
_________________________________
Absence is to love what wind is to fire. It extinguishes the small, it enkindles the great.
~Comte DeBussy-Rabutin~

Sunday, April 24, 2016

बयान ...

हैरान हूँ जन्नत के फ़साने कैसे बयान कर लेते है कुछ लोग यहाँ
क्या सुना दी है तुने उनको, तेरे पहलु में बीते, मेरे हर पल की दास्ताँ
hairaan hoon jannat ke fasaane kaise bayaan kar lete hai kuch log yahan
kya suna di hai tune unko, tere pehlu mein beete, mere har pal ki daastan

इस क़दर हंगामा हुआ वक़्त की बेतहाशा रफ़्तार में ...

इस क़दर हंगामा हुआ वक़्त की बेतहाशा रफ़्तार में
मुर्दा दिल मेरे पास रहा; धड़कने मैं कहीं भूल आया
iss qadar hangaama hua waqt ki betahaashaa raftaar mein
murdah dil mere paas raha; dhadkane main kahin bhool aaya

Wednesday, April 20, 2016

Six Blind Men and An Elephant Story


बहुत समय पहले की बात है , किसी गावं में 6 अंधे आदमी रहते थे। एक दिन गाँव वालों ने उन्हें बताया , ” अरे , आज गावँ में हाथी आया है।” उन्होंने आज तक बस हाथियों के बारे में सुना था पर कभी छू कर महसूस नहीं किया था। उन्होंने ने निश्चय किया, ” भले ही हम हाथी को देख नहीं सकते , पर आज हम सब चल कर उसे महसूस तो कर सकते हैं ना?” और फिर वो सब उस जगह की तरफ बढ़ चले जहाँ हाथी आया हुआ था।

सभी ने हाथी को छूना शुरू किया।

” मैं समझ गया, हाथी एक खम्भे की तरह होता है”, पहले व्यक्ति ने हाथी का पैर छूते हुए कहा।

“अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है।” दूसरे व्यक्ति ने पूँछ पकड़ते हुए कहा।

“मैं बताता हूँ, ये तो पेड़ के तने की तरह है।”, तीसरे व्यक्ति ने सूंढ़ पकड़ते हुए कहा।

” तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी एक बड़े हाथ के पंखे की तरह होता है।” , चौथे व्यक्ति ने कान छूते हुए सभी को समझाया।

“नहीं-नहीं , ये तो एक दीवार की तरह है।”, पांचवे व्यक्ति ने पेट पर हाथ रखते हुए कहा।

” ऐसा नहीं है , हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है।”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी।

और फिर सभी आपस में बहस करने लगे और खुद को सही साबित करने में लग गए।। ।।उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे।

तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुजर रहा था। वह रुका और उनसे पूछा,” क्या बात है तुम सब आपस में झगड़ क्यों रहे हो?”

” हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि आखिर हाथी दीखता कैसा है।” , उन्होंने ने उत्तर दिया।
और फिर बारी बारी से उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझाई।

बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला ,” तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो। तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भाग छुए हैं, पर देखा जाए तो तुम लोगो ने जो कुछ भी बताया वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं।”

” अच्छा !! ऐसा है।” सभी ने एक साथ उत्तर दिया । उसके बाद कोई विवाद नहीं हुआ ,और सभी खुश हो गए कि वो सभी सच कह रहे थे।

कई बार ऐसा होता है कि हम अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं कि हम ही सही हैं और बाकी सब गलत है। लेकिन यह संभव है कि हमें सिक्के का एक ही पहलु दिख रहा हो और उसके आलावा भी कुछ ऐसे तथ्य हों जो सही हों। इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए , और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए।

Once upon a time, there lived six blind men in a village. One day the villagers told them, "Hey, there is an elephant in the village today."
They had no idea what an elephant is. They decided, "Even though we would not be able to see it, let us go and feel it anyway." All of them went where the elephant was. Everyone of them touched the elephant.
"Hey, the elephant is a pillar," said the first man who touched his leg.
"Oh, no! it is like a rope," said the second man who touched the tail.
"Oh, no! it is like a thick branch of a tree," said the third man who touched the trunk of the elephant.
"It is like a big hand fan" said the fourth man who touched the ear of the elephant.
"It is like a huge wall," said the fifth man who touched the belly of the elephant.
"It is like a solid pipe," Said the sixth man who touched the tusk of the elephant.
They began to argue about the elephant and everyone of them insisted that he was right. It looked like they were getting agitated.
A wise man was passing by and he saw this. He stopped and asked them, "What is the matter?"
They said, "We cannot agree to what the elephant is like." Each one of them told what he thought the elephant was like.
The wise man calmly explained to them, "All of you are right. The reason every one of you is telling it differently because each one of you touched the different part of the elephant. So, actually the elephant has all those features what you all said."
"Oh!" everyone said. There was no more fight. They felt happy that they were all right.
The moral of the story is that there may be some truth to what someone says. Sometimes we can see that truth and sometimes not because they may have different perspective which we may not agree too. So, rather than arguing like the blind men, we should say, "Maybe you have your reasons."

Sunday, March 27, 2016

Dust If You Must [Author Unknown]

Dust if you must, but wouldn't it be better,
To paint a picture or write a letter,
Bake a cake or plant a seed,
Ponder the difference between want and need?
Dust if you must, but there's not much time,
With rivers to swim and mountains to climb,
Music to hear and books to read,
Friends to cherish and life to lead.
Dust if you must, but the world's out there,
With the sun in your eyes, the wind in your hair,
A flutter of snow, a shower of rain.
This day will not come 'round again.
Dust if you must, but bear in mind,
Old age will come and it's not always kind.
And when you go and go you must,
You, yourself, will make more dust.
~Author Unknown~

फरीदा ख़ाक न निंदिये, खाकों जेड़ा ना कोई / जिवंदियाँ पैरां तले, मोयां उप्पर होई

फरीदा ख़ाक न निंदिये, खाकों जेड़ा ना कोई...
जिवंदियाँ पैरां तले, मोयां उप्पर होई...
~बाबा फ़रीद जी~
[Transliteration]
Farida khaak naa nindiye, khaakoo jeda naa koye...
Jeevandyan pairaan thale, moyaan upar hoye...
~Baba Fareed Ji~
[Translation]
Fareed, do not slander the dust; nothing is as great as dust... When we are alive, it is under our feet, and when we are dead, it is above us...

Saturday, March 26, 2016

दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ / बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ

दुनिया में हूँ, दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ
~अकबर इलाहाबादी~
[Transliteration]
Duniya mein hoon, duniya ka talabgaar nahin hoon
Bazaar se guzra hoon, kharidaar nahin hoon
~Akbar Allahabadi~
[Translation]
I am in this world, but I don't wish to devour anything from it. I am a wanderer, passing through the marketplace (of life), and I have no desire to acquire anything from here.

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस का है, पल की ख़बर नहीं
~हैरत इलाहाबादी~

[Transliteration] 
Aagah apni maut se koi bashar nahin
Saamaan sau baras ka hai, pal ki khabar nahin
~Hairat Allahabadi~

[Translation]
The time of his death, man cannot foresee
Uncertain of the morrow yet, plans for a century

Promises to the Soul...

Feel the fear and just do it. There's always a way when there is a will. Life is too short for an unlived and unloved life and too long to die carrying the cross of distress.
Forgive others and forgive yourself. And then move on. Forgiveness doesn't means making yourself vulnerable again, use freewill and move away from all anguish, hurt and other low energies. Forgiveness is to let go of all negativity and make space empty only for positivity. Remember you don't find what you don't seek.
Give no excuses and take no excuses. Always be clear cut with the truth and let people handle it on its face value.
Happiness stems from within. Always look within. Don't seek it without.
Let go of pretense; both to self and to the world, and similarly stay away from all those who are pretentious. The world is huge and can accommodate everyone without having the need to needlessly run into each other. They are on a different karmic journey, and you on a different, don't try to change the world, change yourself.
Trust your instincts. Trust yourself. And most of all, implicitly trust God. The accountability starts and ends with God and lies not with the humans.
Keep walking... Keep walking... Keep walking...

Thursday, March 24, 2016

Promise Yourself

Promise Yourself
To be so strong that nothing
can disturb your peace of mind.
To talk health, happiness, and prosperity
to every person you meet.
To make all your friends feel
that there is something in them
To look at the sunny side of everything
and make your optimism come true.
To think only the best, to work only for the best,
and to expect only the best.
To be just as enthusiastic about the success of others
as you are about your own.
To forget the mistakes of the past
and press on to the greater achievements of the future.
To wear a cheerful countenance at all times
and give every living creature you meet a smile.
To give so much time to the improvement of yourself
that you have no time to criticize others.
To be too large for worry, too noble for anger, too strong for fear,
and too happy to permit the presence of trouble.
To think well of yourself and to proclaim this fact to the world,
not in loud words but great deeds.
To live in faith that the whole world is on your side
so long as you are true to the best that is in you.
~Christian D. Larson~

Monday, March 21, 2016

ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे... तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं...

ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं
हमरी उलझन सुलझाओ भगवन
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं
तुम्हीं हमका हो संभाले
तुम्हीं हमरे रखवाले
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं
चन्दा में तुम्हीं तो भरे हो चांदनी
सूरज में उजाला तुम्हीं से
ये गगन है मगन
तुम्हीं तो दिए हो इसे तारे
भगवन ये जीवन
तुम्हीं ना संवारोगे
तो क्या कोई सँवारे
ओ पालनहारे
निर्गुण और न्यारे
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं
जो सुनो तो कहे
प्रभुजी हमरी है बिनती
दुखी जन को, धीरज दो
हारे नहीं वो कभी दुख से
तुम निर्बल को रक्षा दो
रह पाएं निर्बल सुख से
भक्ति को, शक्ति दो
जग के जो स्वामी हो,
इतनी तो अरज सुनो
हैं पथ में अंधियारे
दे दो वरदान में उजियारे
ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं
हमरी उलझन सुलझाओ भगवन
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं

Monday, March 14, 2016

Where is your furniture?

A tourist visited a Sufi.
He was astonished to see that the Sufi’s home was a simple room.
The only furniture was a mat and a kerosene lamp.
Tourist :”Sufi, where’s your furniture?”
Sufi : “Where is yours?”
Tourist : “Mine? But I’m only a visitor here.”
Sufi : “So am I !!”

Thursday, January 14, 2016

A little love can make all the difference...

Imagine eating bland food all your life. Then a stranger comes and introduces you to the salt. The same daal chawal becomes tasty. After a while, the stranger moves away and you go back to eating bland food. It becomes a habit once more. You survive. But something is missing... Kuch toh kami hai... That absence is love... A little love can make all the difference in your life but sometimes it takes a lifetime to realize the difference...


~Irshad Kamil, Lyricist and Poet~

Saturday, December 26, 2015

Joy...

I don't know about happiness but the moment I stopped looking for permanence in this temporary world, I found joy... Unchained, Unlocked...

दवा बंनने से पहले लाज़िम है दर्द का तूफान होना

नसीब-ए-जन्नत के लिए ज़रूरी है फ़ना होना,
दवा बंनने से पहले लाज़िम है दर्द का तूफान होना
[naseeb-e-jannat ke liye zaroori hai fanaa hona,
dawaa bann ne se pehle laazim hai dard ka toofan hona]
The heartache of love must breach the threshold of pain before it can become the path to salvation.

Monday, September 28, 2015

The Wise Woman's Stone

A wise woman who was traveling in the mountains found a precious stone in a stream.

The next day she met another traveler who was hungry, and the wise woman opened her bag to share her food.

The hungry traveler saw the precious stone and asked the woman to give it to him. She did so without hesitation.

The traveler left, rejoicing in his good fortune. He knew the stone was worth enough to give him security for a lifetime. But a few days later he came back to return the stone to the wise woman.

"I've been thinking," he said, "I know how valuable the stone is, but I give it back in the hope that you can give me something even more precious. Give me what you have within you that enabled you to give me the stone."

~The Wise Woman's Stone - Author Unknown~

I am doing what I want...

A turtle was crossing a swamp, covered in mud, when it passed a temple.

There it saw the shell of another turtle – all adorned with gold and precious stones.

"I don't envy you, ancient friend," thought the turtle.

"You're covered in jewels, but I’m doing what I want."

I am doing what I want...


Friday, September 04, 2015

If you make yourself into a doormat...

If you make yourself into a doormat, people will wipe their feet on you. 

~American Proverb~

If you make yourself into a doormat, people will wipe their feet on you.
~American Proverb~

Tuesday, September 01, 2015

गोलमाल है, सब गोलमाल है

बच्चों के बढ़ते होमवर्क
माँ-बाप का जंजाल है
सभी स्कूलों का यही हाल है
गोलमाल है, सब गोलमाल है

फोटो शेयर करते ही
१००० लाइक्स का सवाल है
फेसबुक पर होता बवाल है
गोलमाल है, सब गोलमाल है

ऑनलाइन मंगाई थी चादर
डब्बे में निकला रुमाल है
आजकल यही धमाल है
गोलमाल है, सब गोलमाल है

महंगाई आसमां छू रही
रूपये का भी बुरा हाल है
यह अच्छे दिनों का कमाल है
गोलमाल है, सब गोलमाल है

It is all about you...

Reach out your hands 
Let a joy keep you
Say goodbye to sorrows
Bid them farewell adieu

Get out of the shell
Stay willing to start anew
Be joyful, Be strong
Let the happiness find you

Walk beyond the gloom
Let the sun rays pass thru
The darkness is now history
Each moment bright and new

Believe and live your life
A dream, a passion you pursue
Don't worry about the pitfalls
Courage will help you pull through





Thursday, August 20, 2015

The best way to please the Lord...

A novice went to Abbot Macarius seeking advice about the best way to please the Lord.
- Go to the cemetery and insult the dead – said Macarius.
The brother did as he was told. The following day, he returned to Macarius.
- Did they respond? – asked the abbot.
The novice said no, they didn’t.
- Then go to them and praise them.
The novice obeyed. That same afternoon, he returned to the abbot, who again wished to know whether the dead had responded.
- No – said the novice.
- In order to please the Lord, behave as they do – said Macarius.
“Pay no heed to the insults of men, nor to their praise; in this way, you shall forge your own path.”

Sunday, July 26, 2015

my address forever...

I thrive, and I perish, but I never say never
I dream 'n hope, that's my address forever...




ग़म में मुस्कुराता हूँ और मसर्रत में आह निकलती है


ग़म में मुस्कुराता हूँ और मसर्रत में आह निकलती है

























बिखरा इक शाम तो फिर ज़र्रों को इस तरह बेहिस मिलाया मैंने
अब ग़म में मुस्कुराता हूँ और मसर्रत में आह निकलती है

bikhra ek shaam toh phir zarron ko iss tarah behis milaya maine
ab gham mein muskurata hoon aur masarrat mein aah nikalti hai

Monday, July 20, 2015

कभी मैंने भी...

लबालब भर जाने के बाद
जाम से छलकी शराब
तो आया मुझे याद
कभी मैंने भी इक अजनबी पर
उसकी इंतेहा से ज़्यादा ऐतबार था किया
labalab bhar jaane ke baad
jaam se chalki sharaab
toh aaya mujhe yaad
kabhi main bhi ek ajnabi par
uski intehaa se zyada aitbaar tha kiiya

Monday, June 22, 2015

The Musk Deer

The musk deer story is an invaluable lesson that can set each one of us free.

Once upon a time there lived a magnificent musk deer who was intrigued by a powerful fragrance emitting from somewhere nearby. This scent stirred the inner depths of its soul so profoundly that he was determined to find its source. And his resolute was so intense that the deer carried on this search by day as well as by night, notwithstanding the severity of cold or the intensity of blazing heat. This continued until one day the deer finally lost his foothold and fell from on a cliff resulting in a fatal injury. While breathing its last, the deer found out that the fragrance was coming from a gland that was hidden within his lower abdomen.

To search for joy is an accepted tendency for us all but this chase is certain to become maddening if we constantly look outside, and never within.

Tuesday, June 09, 2015

The Five Steps of a Breast Self-Exam

It is estimated that 1 in 22 women is prone to develop breast cancer during her lifetime.

Here's how to examine yourself [Breast Self-Exam] in 5 steps...

video

Saturday, May 30, 2015

Trees and towns... ~Paulo Coelho~



In the Mojave desert, one often comes across those famous ghost towns that were built around the gold mines. They were abandoned when all the gold had been mined out. They had served their purpose and there was no reason for anyone to go on living there.

When we walk through a forest, we see trees which, once they have served their purpose, have fallen. However, unlike ghost towns, their fall has opened up space for light to penetrate, they have enriched the soil and their trunks are covered in new vegetation.

Our old age will depend on the way we have lived. We can either end up like a ghost town or like a generous tree, which continues to be important even after its fall.

~Paulo Coelho~

Monday, May 25, 2015

Never cut what you can untie.

Never cut what you can untie.

~Joseph Joubert~
[French Author 1754-1824]


Never cut what you can untie.
Never cut what you can untie.

Monday, May 11, 2015

'Success' By Bessie Anderson Stanley [1905]

He has achieved success
who has lived well,
laughed often, and loved much;
who has gained the respect of intelligent men and
the love of little children;
who has filled his niche and accomplished his task;
who has left the world better than he found it
whether by an improved poppy,
a perfect poem or a rescued soul;
who has never lacked appreciation of Earth's beauty
or failed to express it;
who has always looked for the best in others and
given them the best he had;
whose life was an inspiration;
whose memory a benediction.

~'Success' By Bessie Anderson Stanley [1905]~

Saturday, April 11, 2015

For a seed to achieve its greatest expression...

For a seed to achieve its greatest expression, it must come completely undone. The shell cracks, its insides come out and everything changes. To someone who doesn't understand growth, it would look like complete destruction.
~Cynthia Occelli~

Tuesday, March 31, 2015

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती... ~हरिवंश राय बच्चन~

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है,
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है,
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती ,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा-जाकर खाली हाथ लौट आता है,
मिलते न सहेज के मोती पानी में,
बहता दूना उत्साह इसी हैरानी में,
मुठ्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो,
क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो,
जब तक न सफल हो नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम,
कुछ किये बिना ही जय-जयकार नहीं होती,
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।

~हरिवंश राय बच्चन~

महफूज़ हर कदम करना ऐ ख़ुदा, ऐ ख़ुदा

आनी जानी है कहानी
बुलबुले सी ज़िंदगानी
बनती कभी बिगड़ती
तेज़ हवा से लड़ती, भिड़ती

हा रहम, हा रहम, फ़रमाए ख़ुदा
हा रहम, हा रहम, फ़रमाए ख़ुदा
महफूज़ हर कदम करना ऐ ख़ुदा, ऐ ख़ुदा
महफूज़ हर कदम करना ऐ ख़ुदा, ऐ ख़ुदा

साँसों की सूती डोर अनूठी
जल जाएगी, जल जाएगी
बंद जो लाए थे हाथ की मुट्ठी
खुल जाएगी, खुल जाएगी

क्या गुमान करे काया ये उजली
मिट्टी में मिल जाएगी
चाहे जितनी शमाएँ रोशन कर ले
धूप तो ढल जाएगी, जाएगी

सोने चमक में, सिक्कों खनक में
मिलता नहीं, मिलता नहीं
धूल के ज़र्रों में ढूंढे कोई तू
मिलता वहीँ, मिलता वहीँ

क्या मजाल तेरी मर्ज़ी के आगे
बन्दों की चल जाएगी
थामे ऊँगली जो तू, कठपुतली भी
चाल बदल जाएगी, जाएगी


फिल्म : आमिर
गायक : मुर्तज़ा कादिर, अमिताभ और अमित त्रिवेदी
संगीतकार : अमित त्रिवेदी
गीतकार : अमिताभ भट्टाचार्य

Thursday, February 12, 2015

The Star Thrower Story; Loren Eiseley

A man was walking on the beach one day and noticed a boy who was reaching down, picking up a starfish and throwing it in the ocean.
As he approached, he called out, “Hello! What are you doing?”
The boy looked up and said, “I’m throwing starfish into the ocean”.
“Why are you throwing starfish into the ocean?” asked the man.
“The tide stranded them. If I don’t throw them in the water before the sun comes up, they’ll die” came the answer.
“Surely you realize that there are miles of beach, and thousands of starfish. You’ll never throw them all back, there are too many. You can’t possibly make a difference.”
The boy listened politely, then picked up another starfish. As he threw it back into the sea, he said, “It made a difference for that one.”
~The Star Thrower Story; Loren Eiseley~

Wednesday, November 12, 2014

My Child

My Child


My child isn't my trophy to flaunt,
Nor my dummy to taunt!
My child isn't my badge or my honour,
Nor my respect that he/she must protect!
My child isn't an idea or a fantasy,
Nor my reflection or legacy!
My child isn't my puppet or my project,
Nor my pawn or my cadet!


My child is here to fumble & stumble
To get in & out of trouble!
My child is here to try,
To fall & to cry!
My child is here to unravel the mysteries,
To educate oneself & rewrite histories!
My child is here to make his/her own choices,
To exercise his/her free will & experience the consequences!


As a Parent,
My task is to make my child able & capable,
To keep aside my ego & be by his/her side!
My task is to guide & educate,
To let be & not frustrate!
My task is allow him/her to ponder,
And see my child grow into a Wonder!


~Author Unknown~


This is for all the parents... Kindly introspect...

Friday, October 03, 2014

In each of us, the good and the evil are at war. One of them must conquer, and in our own hands lies the power to choose.

A native elder told his grandson that inside of him he has two wolves that are fighting with each other.
One wolf is angry and mean and the other is gentle and loving.
The grandson looked up and asked, “Grandfather, which one will win?”
And the grandfather answered, “Which ever one I feed the most.”

The wisdom behind this native folklore – to defeat the demon inside oneself – is apt as we burn Ravana's effigy. In each of us, the good and the evil are at war. All our lives the fight goes on between them, and one of them must conquer. And in our own hands lies the power to choose.

Happy Dussehra to one and all. May the spirit of goodness prevail over the evil and may it bring blessings of joy, love and peace. Both within and without.

Amen.

Wednesday, August 20, 2014

The best way...

A novice went to Abbot Macarius seeking advice about the best way to please the Lord.

- Go to the cemetery and insult the dead – said Macarius.

The brother did as he was told. The following day, he returned to Macarius.

- Did they respond? – asked the abbot.

The novice said no, they didn’t.

- Then go to them and praise them.

The novice obeyed. That same afternoon, he returned to the abbot, who again wished to know whether the dead had responded.

- No – said the novice.

- In order to please the Lord, behave as they do – said Macarius.

“Pay no heed to the insults of men, nor to their praise; in this way, you shall forge your own path.”

Tuesday, July 29, 2014

Two wolves...

A native elder told his grandson that inside of him he has two wolves that are fighting with each other.

One wolf is angry and mean and the other is gentle and loving.

The grandson looked up and asked, “Grandfather, which one will win?”

And the grandfather answered, “Which ever one I feed the most.”

Tuesday, July 22, 2014

इक असर रखता हूँ

जीने मरने की जुस्तजू, पर इक असर रखता हूँ

ख़्वाबों में आशियां मेरा, मैं वहां बसर करता हूँ

I thrive, and I perish, but I never say never

I dream 'n hope, that's my address forever

Thursday, February 27, 2014

महामृत्युंजय मंत्र Mahamrityunjaya Mantra

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥


Om Tryambakam Yajamahe
Sugandhim Pushtivardhanam
Urvarukamiva Bandhanan
Mrityor Mukshiya Maamritat


OM, we worship and adore you, O three-eyed one, O Shiva. YOU are the fragrance of life, nourishing us, restoring our health. YOUR will enables us to thrive. We surrender to YOU, O Divine Being (Shiva), YOU who embodies the power of will, the power of knowledge, and the power of action. We pray to YOU, the Absolute Divine Being, who nourishes, strengthens, causes to increase (in health, wealth, well-being); who gladdens, exhilarates, and restores our health, manifesting as the eternal nourisher of (the plant of) life. And like the stem of the cucumber weakens, and the gourd is freed from the vine in due course of time, similarly please disentangle us, liberate us from the bondage of attachment and death, from all physical, psychological, and spiritual foes, O Lord of Life.


Friday, October 11, 2013

भगवान् की प्राप्ति...

एक मल्लाह था।

मन में बड़ी अशांति, बहुत दुःखी था।

उसके मन में विचार आया कि अब भगवान् की तरफ चलना चाहिए, शान्ति प्राप्ति करनी चाहिए। तीर्थयात्रा जाए और भगवान् के दर्शन प्राप्त करे।

उसकी पत्नी ने कहा कि तीर्थयात्रा जाने से शान्ति नहीं मिलेगी। शान्ति भीतर है। जब तक हम अपने अंतरंग नहीं जायेंगे तब तक शान्ति नहीं मिलेगी।

मल्लाह नहीं माना, कहने लगा कि मैं तो तीर्थयात्रा के लिए जाऊँगा और वहाँ से शान्ति ले करके आऊँगा।

वह तीर्थयात्रा की तैयारियाँ करने लगा।

उसकी पत्नी भी साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। उसने एक रूमाल में चार बैंगन बाँधकर रख दिए और जहाँ- जहाँ पतिदेव ने तीर्थयात्रा की, वहाँ- वहाँ वह स्वयं भी नहायी और पानी में बैंगनों को भी स्नान कराया। जहाँ- जहाँ दर्शन के लिए पतिदेव गये, वहाँ स्वयं भी दर्शन किया और उन चार बैंगनों को भी दर्शन कराया।

यात्रा करने के बाद जब घर वापिस आये तब पत्नी ने सारे तीर्थों की दर्शन कर चुके, सब नदियों में स्नान कर चुके बैंगनों की उसने सब्जी बनाई।

मल्लाह की थाली में परोसा तो उसे बड़ी दुर्गन्ध आयी।

कहने लगा, "अरे यह क्या है? बदबू के मारे मेरी नाक सड़ी जा रही है।"

पत्नी ने कहा कि ये वह बैंगन हैं, जो चारों धाम की यात्रा करके आये हैं। ये वह बैगन हैं, जो भगवान् के सारे तीर्थ के दर्शन करके आये हैं। इनमें तो सुगंध होनी चाहिए थी, स्वाद होना चाहिए था। परन्तु जब ये बैंगन सुगंध, खुशबू और स्वाद न प्राप्त कर सके, तो फिर तीर्थयात्रा और कर्मकाण्ड आपको क्या शान्ति दे पायेंगे?

मल्लाह के हृदय कपाट खुल गये और उसने अपने भीतर भगवान् को तलाश करना शुरू कर दिया।

Sunday, September 22, 2013

कच्चा घड़ा

एक व्यक्ति सुकरात के पास गया और कहने लगा कि मुझे ऐसा उपाय बताइये, जिससे मैं भगवान् का साक्षात्कार कर सकूँ। भगवान् तक पहुँच सकूँ। 

सुकरात ने कहा- ‘अच्छा तुम कल आना, फिर मैं तुम्हें उसका मार्गदर्शन करूँगा।’ 

दूसरे दिन वह व्यक्ति सुकरात के पास पहुँचा। 

सुकरात ने मिट्टी का एक घड़ा मँगाकर रखा था। वह पकाया नहीं गया था, वरन् मिट्टी का बना हुआ कच्चा घड़ा था। 

सुकरात ने कहा- ‘जाओ, मेरे लिए एक घड़ा पानी लाओ। मैं पानी पी लूँ, उसके उपरांत मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करूँगा।’

कच्चा घड़ा लेकर वह व्यक्ति कुएँ पर गया। रस्सी बाँधी और रस्सी बाँधकर के उसको कुएँ में डुबोया। खींचते- खींचते घड़े का बहुत सारा हिस्सा, कोना टूट- फूट गया। किसी तरीके से थोड़ा- बहुत पानी लेकर वह घड़ा ऊपर आया। घड़े को उसने सिर पर रखा, हाथ पर रखा। सुकरात के पास उसे लेकर जब तक वह पहुँचा, मिट्टी का वह घड़ा बिखर गया।

उसने सुकरात से कहा कि- जो घड़ा आपने मुझे पानी भरने के लिए दिया था वह रास्ते में ही बिखर गया।

सुकरात ने कहा- ‘ठीक यही फिलॉसफी भगवान् का प्यार प्राप्त करने और भगवान् का अनुग्रह प्राप्त करने की है। कच्चा घड़ा अपने भीतर पानी को धारण नहीं कर सका। उसके लिए जरूरत इस बात की पड़ती है कि घड़ा पक्का हो। अगर हमारे पास पक्का घड़ा है, तो पानी भर जायेगा, ठंडा रहेगा, बेतकल्लुफ खड़ा रहेगा और पानी हमको मिल जायेगा। अगर घड़ा कच्चा है, तो पानी बिखर जायेगा।’

Friday, March 15, 2013

Day of Reckoning...


There was a wildfire in the jungle.

All the animals were terrified and running for their lives.

In this chaos, an ant was repeatedly filling her mouth with water, carrying it to the edge of the fire, and splashing it in hope of dousing the fire.

But her mouth was too small to carry any large amount of water, and thus this exercise was appearing too futile to the other animals who were watching the ant in astonishment.

Someone asked the ant, “What are you doing? Don’t you know you are ill equipped to bring down this fire?”

The ant replied, “On the day of reckoning, God will segregate us in three groups.”

“The first group will comprise of those who lit the fire. The second group will comprise of those who saw the fire and did nothing. And last but not the least, would be a group which will comprise of those who tried to douse it.”

“I am doing my bit to find a spot in that third group”

Tuesday, December 18, 2012

Yeh naa thi humari qismat, ke visaal-e-yaar hota...



The sheer poetic genius of Mirza Ghalb...

The hauntingly beautiful voice of Farida Khanum...
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Yeh naa thi humari qismat, ke visaal-e-yaar hota...
Agar aur jeete rehte, yahi intezaar hota...

Tere vaade par jiye hum, toh yeh jaan jhooth jaana...
Ke khushii se marr na jaate, agar aitbaar hota...

Kahun kis se main ke kya hai, shab-e-gham buri balaa hai...
Yeh khalish kahaan se hoti, joh jigar ke paar hota...

Hue hum joh marr ke rusavaa, hue kyun na gharq-e-dariyaa...
Na kahin janaazaa uthataa, na kahin mazaar hota...

Kahun kis se main ke kiyaa hai, shab-e-gham buri balaa hai...
Mujhe kya buraa tha marna, agar ek baar hota...

Ye masaail-e-tasavvuf, yeh tera bayaan Ghalib...
Tujhe ham vaalii samajhate, jo na baada-khwaar hota...

Wednesday, September 19, 2012

विद्या लक्ष्मी

एक नौजवान हार्वर्ड युनिवेर्सिटी की मार्केटिंग डिग्री लेकर हिंदुस्तान
लौटा और उसने एक बड़ा सा स्टोर खोला…

कम दाम - ज्यादा सामान…

परन्तु उसका स्टोर चला नहीं...

उसके स्टोर के सामने एक छोटी किराने की दूकान थी जो ऐसे चलती थी जैसे
लाला सामान मुफ्त में बाँट रहा हो…

6 महीने बाद तंग आ कर नौजवान ने अपना स्टोर बेचने के लिए बाहर बोर्ड लगा दिया…

सामने की दूकान का लाला आया, और नगद पैसे दे कर उसकी जगह खरीद ली…

नौजवान हैरान हुआ और उसने लाला से उसके व्यापार के बारे में पुछा…

लाला बोला, "भईया, बेचते तो हम भी वो ही सामान है जो तुम बेचते हो,
परन्तु हम कम मुनाफे पर काम करते हैं… सीधी बात है, सिर्फ 1% मुनाफे पर
काम करो, माल ज्यादा बिकेगा और तभी काम चलेगा…"

नौजवान हैरान हुआ, "सिर्फ 1%?"

लाला ने जवाब दिया, "हाँ, जैसे की कोई चीज़ 1 रुपये की आई तो मैं उस को 2
रूपये में बेच देता हूँ, यानी की सिर्फ 1% मुनाफा…"

नौजवान को लाला के गणित पर तरस आया और बोला, "लाला जी, अगर आप 1 रूपये की
चीज़ 2 रूपये में बेचते हो तो यह 1% नहीं, 100% मुनाफा हुआ…"

लाला बोला, "हिसाब तो मुझे आता नहीं भईया, अपनी अपनी किस्मत की बात है …
तुम्हारे पास विद्या है, मेरे पास लक्ष्मी है…"

यह कह के लाला ने स्टोर को ताला लगाया और अपनी दूकान की तरफ लौट गया जहाँ
सामान खरीदने के लिए व्याकुल भीड़ उसका इंतज़ार कर रही थी …

6 महीने और बीते…

हार्वर्ड से लौटा हुआ वह नौजवान रेस कोर्स में घोड़ो पर दांव पे दांव
लगाये जा रहा था और अपने सारे पैसे हारे जा रहा था… सुबह से शाम होने को
आई परन्तु उसके लगाये हुए एक भी घोड़े के हिस्से में जीत नहीं आई…

हताश हो कर वह लौटने लगा की तभी उसने देखा की किराने की दूकान वाला लाला
रेस कोर्स में आया और आते ही 21 नंबर के घोड़े पर पैसा लगाया…

रेस चालू हुई और 21 नंबर का घोडा जीत गया…

नौजवान हैरान परेशान...

लाला के पास गया और बोला, लाला जी मुझे पहचाना, 6 महीने पहले आपने मेरा
स्टोर खरीदा था… एक बात पूछनी थी… क्या आपको पहले से ही मालुम था की आज
21 नंबर का घोडा जीतेगा और इसी जानकारी के चलते आपने अंदर आते ही उस घोड़े
पे दांव खेला…

लाला बोला, "नहीं भईया, मैं यहाँ से जा रहा था की मैंने सोचा चलो, आज 7वे
महीने का 4था रविवार है, और 7x4=21, बस यह ही सोच कर मैंने 21 नंबर पर
दांव लगा दिया.. …

नौजवान को लाला के गणित पर तरस आया और बोला, "लाला जी, आपका हिसाब गलत
है, 7 को अगर 4 से गुणा करो तो नतीजा 21 नहीं 28 होता है…"

लाला बोला, "हिसाब तो मुझे आता नहीं भईया, अपनी अपनी किस्मत की बात है …
तुम्हारे पास विद्या है, मेरे पास लक्ष्मी है …"